रिटायरमेंट के बाद शर्मा जी का दिन अब चाय, अख़बार और बालकनी से आते-जातों को देखने तक सिमट गया था। बेटा-बहू ऑफिस जाते, पोता स्कूल। पूरा दिन घर चुप्पी में डूबा रहता।
लेकिन शर्मा जी के कमरे में एक चीज़ हमेशा चालू रहती — पुराना रेडियो।
भले ही उसकी आवाज़ अब थोड़ी कर्कश हो गई थी, लेकिन हर सुबह 8 बजे वह 'विविध भारती' पर "भूले-बिसरे गीत" जरूर बजाता।
कभी शर्मा जी की पत्नी सुनती थीं, चाय बनाते हुए मुस्कुराकर बोलतीं — "देखो, ये हमारा गाना आया है!" अब वह आवाज़ नहीं थी, लेकिन रेडियो पर वही गाना रोज़ आता रहा।
एक दिन बहू ने नया म्यूजिक सिस्टम लाकर कहा —
"पापा जी, इसे बदल दीजिए। ये पुराना कबाड़ा अब नहीं चलता ठीक से।"
शर्मा जी ने धीरे से रेडियो को देखा, फिर मुस्कुराकर बोले —
"चलता तो है बेटा... यादों के रास्ते पर, बहुत ठीक से चलता है।"
बहू कुछ न बोली। अगले दिन से उसने चाय उसी गाने के साथ परोसनी शुरू कर दी।
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