रेलगाड़ी का आख़िरी डिब्बा अक्सर सबसे शांत होता है—कम भीड़, कम चिल्ल-पों। वहीं बैठा था अंशु, खिड़की से बाहर खेतों को देखते हुए। उसके पास एक छोटा बैग था, और दिल में बहुत बड़ी उलझन।
वो घर लौट रहा था—तीन साल बाद। जब गया था, तब ग़ुस्से में था, कहकर गया था, “अब इस घर में वापस नहीं आऊँगा।” लेकिन वक़्त और अनुभव ने उसे मथ डाला था। शहर की चकाचौंध में रिश्तों की धुंध कहीं और गाढ़ी हो गई थी।
सामने वाली सीट पर एक बूढ़ी औरत बैठी थी। हाथों में ऊन और सलाइयाँ, चेहरे पर गज़ब की शांति।
अंशु ने यूँ ही पूछ लिया, “दादी, आप कहाँ जा रही हैं?”
वो मुस्कुराईं, “बेटा, घर। बेटे से लड़ाई हो गई थी, पर अब लगता है, लड़ाई से बड़ा कुछ नहीं होता।”
अंशु चुप हो गया। उसी पल एक स्टेशन आया। दादी उतर गईं, लेकिन जाते-जाते उसके हाथ में ऊन की एक नर्म सी टोपी थमा दीं।
अंशु ने ऊन की वह नर्म टोपी हाथ में ली, जैसे कोई पुरानी गर्म याद छू गई हो। खिड़की से बाहर खेत अब धुंधलाने लगे थे, लेकिन उसके भीतर एक clarity आ चुकी थी।
वो जान गया था—जैसे रेलगाड़ी की पटरी कभी एक-दूसरे को नहीं छोड़तीं, वैसे ही रिश्तों में दूरी हो सकती है, लेकिन जुड़ाव बना रहता है।
घर लौटना अब एक मजबूरी नहीं था... एक अवसर था।
और इस बार, अंशु आख़िरी डिब्बे से नहीं, दिल के पहले डिब्बे से उतरना चाहता था—जहाँ माँ खड़ी थीं, बाँहें फैलाए, बिना कोई सवाल किए।

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