इस सप्ताह बहुत कुछ ऐसा हुआ — अच्छा भी, बुरा भी — जो अविस्मरणीय था। चाहे दिल्ली का बम ब्लास्ट हो, जिसे समाज के पढ़े लिखे कहे जाने वाले लोगों ने अंजाम दिया। जी हाँ - वाइट कालर लोगो ने— हर जगह बस इसी की बातें हो रही थीं।
लेकिन आज मेरी कलम किसी और कहानी के लिए उठ रही है।
14 नवंबर को बिहार में वोटों की गिनती शुरू हुई और एनडीए ने विपक्ष को बुरी तरह हराया। इस बार आरजेडी की खिचड़ी चढ़ी तो सही, लेकिन दम ही नहीं आया। अरे भैया… रसोई तो गर्म थी ही, लेकिन क्या करें — माहौल ही ठंडा हो गया! और इसका सबसे बड़ श्रेय जाता है बिहार की उन महिलाओं को, जिन्होंने 21वीं सदी में लालटेन की रोशनी में जीने से इनकार कर विकास का मार्ग चुना। उन्हें शत-शत नमन—क्योंकि इस बार वोट सिर्फ पड़े नहीं… समझदारी से पड़े । जमाना बदल जो चुका है।
और इस बदलते बिहार की हवाओं में एक नाम पूरी शिद्दत से गूंज रहा है — मैथिली ठाकुर।
एक ऐसी लोक-गीत गायिका, जिसने बॉलीवुड की चमक-धमक को ठुकरा दिया और लोक-संगीत को ही अपना धर्म बनाकर पूरे देश में उसकी पहचान को मजबूत किया।
मुझे आज भी याद है- सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद उन्होंने अपने YouTube वीडियो में यह कहा था कि वे अब कभी भी बॉलीवुड का गाना नहीं गाएंगी। उनका यह दृढ़ निर्णय ही उनकी पहचान और सोच का वास्तविक प्रमाण है।
ऐसा नहीं है कि लोकगीत गायिका सिर्फ़ मैथिली ठाकुर ही हैं। और भी कई नाम गिनती में आते हैं… जैसे... जैसे नेहा सिंह राठौर। पर उनका नाम ज़्यादातर ग़लत वजहों से ही चर्चा में रहा है। लोक-गीत गायिका’ होने का दावा करने वाली नेहा सिंह राठौर, हर बार चुनाव से पहले टिकट के लिए ललायित दिखती हैं। उन्होंने, टिकट के लिए, NDA सरकार को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़ा—वो भी लोक गायिका का रूप धरकर। कभी “बिहार में का बा” गाकर राजनीतिक सुर्खियों में आने की कोशिश, तो कभी बहसों में जगह बनाने की कवायद।
लेकिन जब इस पर मैथिली ठाकुर ने जवाब दिया, तो सोशल मीडिया एक ही सुर में बोल उठा —
“लोक-गीत गाना एक कला है, लेकिन लोक-गीत को जीना एक संस्कार — और मैथिली ने इसे जीकर दिखाया है।”
छोटी उम्र से साड़ी पहनना, कृष्ण-भक्ति में डूबी आवाज़ में गीत गाना, और घर की दीवारों पर मिथिला आर्ट उकेरना — यह सब उनके जीवन का हिस्सा रहा है।
चाहे लोक-गायिका के रूप में, या भाइयों की दुलारी बहन के रूप में, या फिर मिथिला की बेटी के रूप में — लोगों ने उनके हर रूप पर स्नेह लुटाया। इसका सबसे ठोस प्रमाण?
आरजेडी के प्रत्याशी को हराकर मिली उनकी भारी विजय।
और बात जब जीत की हो रही है, तो जन सुराज पार्टी का जिक्र होना भी स्वाभाविक है। इतना बड़ा अभियान, इतना शोर — लेकिन नतीजा?
किधर गए प्रशांत किशोर जी?
सुना है जन सुराज पार्टी ने 238 सीटों पर चुनाव लड़ा था।
नतीजा — एक भी सीट नहीं।
वोट मिले — सिर्फ 2–3%।
ऊपर से जिम्मेदारी एनडीए सरकार की 10 हज़ार नकद योजना पर डाल दी।
भैया, अब क्या ही कहें… खिसियानी बिल्ली तो आखिर खंभा ही नोचेगी!
बिहार की जनता ने इस बार एक सीधा संदेश दिया —
“जो दिल से बात करेगा, विकास की बात करेगा — वही जीतेगा। बूथ लूटने और फर्जी वोटरों का ज़माना अब गया।”
और मैथिली ठाकुर ने यही किया — अपनी सादगी और संस्कृति से जनता का दिल जीत लिया।
मैथिली ठाकुर की इस जीत पर उन्हीं के द्वारा गाया एक लोकगीत गुनगुनाने का मन कर रहा है...
जुग जुग जियसु ललनवा,
भवना के भाग जागल हो,
ललना लाल होइहे,
कुलवा के दीपक मनवा में,
आस लागल हो ॥आपकी इस महत्वपूर्ण विजय पर हार्दिक अभिनंदन, मैथिली जी। हम आपकी निष्ठा और नेतृत्व से बड़ी अपेक्षाएँ रखते हैं।
इस पोस्ट को अंग्रेज़ी में यहाँ पढ़ें:
👉 The Youngest MLA :- Maithili Thakur !
चलते हैं फिर… अगले ब्लॉग में मुलाक़ात होगी।
तब तक के लिए, अपना ख्याल रखें, मुस्कुराते रहें, और हर पल को दिल से जिएं।
याद रखिए, ज़िंदगी अपने रंग खुद चुनती है — और हमें बस उन्हें अपनाना है।
…अनु
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