July 27, 2026

जब शुरुआत ही अच्छी नहीं रही, तो भला अंत अच्छा कैसे होगा?

आंदोलन खत्म हो जाते हैं, लेकिन सवाल बाकी रह जाते हैं

आंदोलन खत्म हो जाते हैं, लेकिन सवाल बाकी रह जाते हैं

NEET पेपर लीक के विरोध में जंतर-मंतर पर चल रहा विरोध प्रदर्शन, सोनम वांगचुक द्वारा भूख हड़ताल समाप्त किए जाने और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद आखिरकार थम गया है। इसके साथ ही, इस उथल-पुथल से भरे घटनाक्रम का एक प्रमुख अध्याय समाप्त हो गया है। हालाँकि विरोध प्रदर्शन अब समाप्त हो चुके हैं, लेकिन उन्होंने मेरे मन में कई सवाल छोड़ दिए हैं।

जब भी मैं कोई आंदोलन देखती हूँ, तो मेरा ध्यान सिर्फ नारों पर नहीं जाता। मैं यह भी देखती हूँ कि उसके बाद क्या होता है।

  • आंदोलन का नेतृत्व कौन कर रहा है?
  • वे किस बात के लिए लड़ रहे हैं?
  • वे इस मुकाम तक कैसे पहुँचे?
  • और सबसे ज़रूरी बात—क्या सत्ता मिलने के बाद भी वे अपने पुराने सिद्धांतों पर टिके रहते हैं?

असम गण परिषद (AGP) के आंदोलन के समय मैं बहुत छोटी थी। लेकिन मुझे आज भी बोडो उग्रवादियों के अपने अधिकारों के लिए लड़ने की खबरें याद हैं।

ममता बनर्जी के आंदोलन के समय मुझे उनसे बहुत उम्मीदें थीं। जब वे चुनाव जीतीं, तो मैंने अपने कमरे में खुशी से डांस किया था।

यही उम्मीद मुझे अरविंद केजरीवाल के आंदोलन से भी थी। उस आंदोलन ने लोगों का भरोसा जीत लिया था। लाखों लोग उससे जुड़े। मैं भी उनमें से एक थी। मैंने भी अपनी मेहनत की कमाई उस आंदोलन को दी थी।

लेकिन आज पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो लगता है कि वह पैसा व्यर्थ चला गया।

हर आंदोलन खुद को सबसे अलग बताता है। लेकिन न असम गण परिषद का आंदोलन, न ममता बनर्जी का आंदोलन और न ही अरविंद केजरीवाल का भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन, आखिरकार दूसरों से अलग साबित हुआ।

तो फिर मैं CJP के इस आंदोलन पर कैसे भरोसा करूँ, जब इसकी शुरुआत ही ("Cockroach" जैसे शब्द के इस्तेमाल से) मुझे सही नहीं लगी?

"Well begun is half done."

यही पहली बार नहीं है जब मैंने उम्मीदों को टूटते देखा है।


असम आंदोलन

इतिहास बताता है कि छात्र आंदोलनों ने कई बार सरकारें बनाई हैं।

असम का छह साल लंबा छात्र आंदोलन असम गण परिषद (AGP) के रूप में सामने आया और 1985 में उसने सरकार भी बनाई।

लेकिन सरकार बनने के बाद धीरे-धीरे लोगों को लगने लगा कि जिन आदर्शों के नाम पर आंदोलन हुआ था, सरकार उन पर पूरी तरह खरी नहीं उतर सकी।

यहीं से मैंने सीखा कि आंदोलन जीतना और सरकार चलाना—दो अलग-अलग बातें हैं।


ममता बनर्जी का आंदोलन

फिर ममता बनर्जी का आंदोलन आया।

नंदीग्राम आंदोलन और एक निडर नेता की उनकी छवि ने उन्हें 2011 में सत्ता तक पहुँचा दिया। लोगों को विश्वास था कि अब पश्चिम बंगाल में नई राजनीति देखने को मिलेगी।

लेकिन किसी भी आंदोलन का असली मूल्यांकन उसके नारों से नहीं, बल्कि उसके काम से होता है।

समय के साथ राजनीतिक हिंसा, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था पर सवाल उठने लगे।

सिंगूर विवाद के बाद टाटा नैनो परियोजना का पश्चिम बंगाल छोड़कर गुजरात जाना हो या हाल ही में आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर के कथित बलात्कार और हत्या का मामला—इन घटनाओं ने शासन और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए।

एक समय था जब मैं भी उनके भाषण बहुत ध्यान से सुनती थी।

आज मैं अक्सर सोचती हूँ—क्या उन्होंने अपना cerebellar balance खो दिया है?

वरना चुनाव जीतने के बाद वह समझदार और निडर महिला आखिर कहाँ गायब हो गई?

शायद सत्ता इंसान को उसके अपने ही सिद्धांतों से दूर कर देती है।


वादा क्या था... और मिला क्या?

अरविंद केजरीवाल का भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन भी अलग नहीं निकला।

उस आंदोलन ने भी लोगों में नई उम्मीद जगाई थी।

लेकिन जैसे-जैसे सत्ता बढ़ी, राजनीति भी बदलती गई।

"Hum Delhi Ke Malik Hain" वाली छवि महज़ दस सालों में ही धुंधली पड़ गई और उसकी जगह तानाशाही ने ले ली।।

जिस आम आदमी की बात होती थी, उसी आंदोलन पर तानाशाही के आरोप लगने लगे।

पार्टी के संस्थापक साथियों को बाहर कर दिया गया। नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। "Sheesh Mahal" विवाद ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या यह आंदोलन भी उसी व्यवस्था का हिस्सा बन गया, जिसके खिलाफ यह शुरू हुआ था।


आज मैं हर आंदोलन से सिर्फ चार सवाल पूछती हूँ

  • वादा क्या था?
  • मिला क्या?
  • क्या नेता अपने पुराने सिद्धांतों पर टिके रहे?
  • क्या सत्ता मिलने के बाद भी उनका चरित्र वही रहा?

इन्हीं सवालों के जवाब तय करते हैं कि मैं किसी नए आंदोलन पर भरोसा करूँ या नहीं।

इसीलिए मैं CJP आंदोलन के नारों के साथ नहीं चल सकी।

भरोसा ऊँची आवाज़ों से नहीं बनता।

भरोसा बनता है चरित्र, निरंतरता और ईमानदारी से।

और जब शुरुआत ही सवालों के घेरे में हो—जैसे "Cockroach" शब्द के इस्तेमाल से—तो मुझे वही पुरानी कहावत याद आती है—

"Well begun is half done."

आज की खबर ने मेरी सोच और मजबूत कर दी

आज सुबह यह खबर देखकर मुझे लगा कि CJP आंदोलन में शामिल न होने का मेरा फैसला सही था।

सब अपनी-अपनी रोटियाँ सेक रहे हैं।

आपको लगता है कि वे आपके लिए मरने को तैयार हैं, लेकिन ऐसा नहीं है।

जब आप घरवालों की बात सुने बिना ऐसे आंदोलनों में शामिल होते हैं और अपनी जान गंवा देते हैं, तब सबसे ज़्यादा दर्द किसी नेता को नहीं होता।

मरता तो सिर्फ आपका परिवार है।




चलते हैं फिर… अगले ब्लॉग में मुलाक़ात होगी।

तब तक के लिए, अपना ख्याल रखें, मुस्कुराते रहें, और हर पल को दिल से जिएं।

याद रखिए, ज़िंदगी अपने रंग खुद चुनती है — और हमें बस उन्हें अपनाना है।

…अनु


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